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जलझूलनी एकादशी

जलझूलनी एकादशी

यह भारतीय संस्कृति का एक महान पर्व है जिसका संबंध द्वापर युग से है ।यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आता है ।भगवान श्री कृष्ण के मामा कंस के कारागृह में जन्म के पश्चात वासुदेव जी उन्हें यमुनापार अपने मित्र नंद बाबा के यहां नंद गांव में छोड़ आए थे तथा माता यशोदा को उत्पन्न कन्या के बदले उन्हें पुत्र दे कर के वापस कारागृह में आ गए थे ।श्री कृष्ण के जन्म के ठीक 20 दिन पश्चात माता यशोदा जी को उनके सगे संबंधी एवं नंद गांव की महिलाएं उन्हें जल पूजन अर्थात जलवा पूजन के लिए यमुना नदी के घाट पर लेकर गई थी।

माता यशोदा को कन्या जन्म के पश्चात उन्हें घर के कामकाज करने से रोक दिया गया था। प्रसूति के ठीक 20 दिन पश्चात घर पर चांद सूरज की पूजा करवा कर उन्हें यमुना मैया के घाट पर जल दर्शन करवाने तथा पूजन करवाने के लिए ले जाया गया था। आज भी उसी प्रतीक परंपरा का इसी रूप में निर्वहन होता चला आ रहा है। श्री कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक 20 दिन पश्चात अर्थात भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को विभिन्न समाजों के मंदिरों से ठकुराइन जी के विग्रह को साज सज्जा और भव्य आभूषणों के श्रृंगार के साथ नगर ,गांव ,कस्बे के नजदीकी कुंए, सरोवर, नदी किनारे ले जाया जाता है ।प्रत्येक समाज की पंचायतों के सभी मंदिरों से यह विमान निकल कर एक शोभायात्रा का रूप ले लेते हैं ।जलवा पूजन की अनिवार्य मान्यता यह है कि सूर्यास्त के पूर्व ठकुराइन जी का विमान जलधारा या सरोवर के घाट पर पहुंच जाना चाहिए । माता यशोदा को जल दर्शन के प्रतीक रूप में ठकुरानी जी के विग्रह को जल दर्शन करवा कर घाट पर पूजा अर्चना की जाती है तत्पश्चात विग्रह श्री की आरती करके उन्हें वापस समाज के लोग अपने कंधे पर विमान रखकर मंदिर तक ले आते हैं ।लौटते समय सभी विमानों की जगह जगह आरती उतारी जाती है ।बारां में धूमधाम से मनाए जाने वाले इस पर्व को डोल ग्यारस या “डोल मेले “के नाम से जाना जाता है। इस मेले की शुरुआत इसी दिन से होती है जो 15 से 20 दिनों तक चलता है ।माता यशोदा के जलवा पूजन की परंपरा संपूर्ण देश में कायम है परंतु राजस्थान में बारां का डोल मेला अपनेअलग सांस्कृतिक वैशिष्ट्य के कारण सुप्रसिद्ध है ।

राजस्थान की सुप्रसिद्ध लोक संस्कृति कर्मी श्रीमती कौशल्या देवी शर्मा बताती है कि आज भी गर्भवती महिलाओं को पुत्र जन्म के पश्चात घर के कामकाज से रोक दिया जाता है और प्रसूति के ठीक 20 दिन पश्चात माता यशोदा की उसी परंपरा के निर्वहन रूप में घर पर पीली मिट्टी और गोबर से लिप कर चौक बनाया जाता है ।उस चौक में हल्दी से चांद सूरज बनाकर ,लापसी (अनाज को उबाल कर गुड़ मिलाकर बनाए जाने वाला एक प्रकार का राजस्थानी व्यंजन) के पांच पिण्ड गणेश जी के विग्रह रूप में बनाए जाते हैं । उन्हें पाटे केऊपर रख दिया जाता है। सामने गेहूं
के ढेर पर कलश रख दिया जाता है ।पूजा करने के लिए जब महिलाएं माता को इस स्थान पर लाती हैं तो पीछे से उनका पल्लू देवर द्वारा पकड़ा जाता है तत्पश्चात माता को लाल लूगडा जिसमे पीली धारी होती है,पहनाया जाता है,जिसे घांट कहते हैं। फिर फूल,बताशा , रोली चावल से कलश ,गणेश जी और चांद ,सूरज तथा दहलीज की पूजा करवाई जाती है। हल्दी से बने चांद सूरज के दर्शन करवाए जाते हैं। पूजा के बाद माता की कमर में शिशु के अधोवस्त्र (पोतडा ) को टांका जाता है। उन्हें पति की जूतियां पहनाकर माथे पर खाली कलश रखकर उसमें आम के पत्ते रखकर उन्हें नजदीकी कुएं, सरोवर या नदी के घाट पर ले जाया जाता है। वहां जाकर के जन्म देने वाली जन्म दात्री महिला को जल दर्शन करवाया जाता है ,उनसे कलश में पानी भरवाया जाता है,तत्पश्चात सभी महिलाएं वहां पूजा-अर्चना करवा कर जन्म दात्री माता को वापस घर लाती हैं ।लौटते में जन्म दात्री माता की साड़ी का पल्लू ननंद पीछे से पकड़ कर,अपनी भाभी को महिलाओं के साथ लेकर के,गीत गाती हुई कुंए ,नदी या तालाब से घर पर लेकर आती है। इस पर्व पर महिलाओं को गुड़ घूघरी बांटी जाती है।

इसे घर से बाहर निकालना भी कहा जाता है। ये सभी रस्में माता यशोदा जी द्वारा नन्दगांव में पूरी की गई थी ।आज भी शादी ब्याह के पश्चात की यह परंपरा राजस्थान की लोक संस्कृति में एक अपनाअहम स्थान रखती है जो इस बात को इंगित करती है कि जन्म दात्री माता अब घर के कामकाज करने में सक्षम है और इस दिन के बाद वह घर में चौका चूल्हा कर सकती है।

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